एक ऐसी बेटी की कहानी जो शादी के बाद एक माह ससुराल का जुल्म सहन कर मायके आती है, माँ-बाप उसके दुख को सुन दुखी न हो जाएं ये सोच वह अपने दर्द को छुपा लेती परन्तु गौना कराने दरवाजे पर आये लोभी ससुराल पक्ष को देख उसके धैर्य की सीमा टूट पड़ती है…… आगे ….. रो रो कर बेहाल हुयी है, झील सी आँखें लाल हुयी है, हे परमेश्वर, हे जगदीश्वर, माँ अम्बे हे ,देव महेश्वर, आजा जुल्म की ब्यथा सूना दूँ, कहाँ छुपे हो तुम्हें पुकारूँ, थक जग हारी, रब से प्यारी, कहाँ जाये अब एक बेचारी, फूल सी बेटी दर्द बयाँ अब कुहुँक-कुहुँक कर करती है, रोक लो बाबुल मुझको, बेटी तेरी पावं पकड़ती है, रोक लो बाबुल मुझको……….. बाग़ की तेरी कली हूँ मैं, तूने नाजों से पाला है, मुझे सुलाने की खातिर तू, जाग के रात गुजारा है, चहक रही थी बाग़ में तेरे, खुशियां थी संसार में मेरे, बिन मांगे कल तक सब जाना, आज तू बिटिया ना पहचाना, एक दर्द था तड़प गए, सौ दर्द फफक कर कहती है, रोक लो बाबुल मुझको, बेटी तेरी पावं पकड़ती है | रोक लो बाबुल मुझको…………… तेरी बिटिया जान तुम्हारी, पगड़ी की थी शान तुम्हारी, फूल सी बिटिया तेरी मैया, हो गयी कितनी आज बेचारी, देख ले काजल आँखों का अब गालों पर ही रहती है, गंगा, यमुना सी ये आँखें झर-झर बहती रहती है, तड़प कलेजे से लग माँ के, बिन बाती दीपक सी जाके, एक अभागन कहती है, रोक लो माँ तुम मुझको बेटी,तुमसे बिनती करती है | रोक लो बाबुल मुझको…………… कितनी खुशियां जश्न मनाया, रानी जैसा मुझे सजाया, दुनिया भर सामान के संग में, डोली साज के बिदा कराया, डोली बीच मैं तरस रही थी, बिन जल मछली तड़प रही थी, आँसूं थी पर आस लगी थी, आगे स्वर्ग सी द्वार खड़ी थी खुशियों की दहलीज़ पर बेेटी,हर दिन भूखी रहती है, रोक लो बाबुल मुझको, बेटी तेरी पावं पकड़ती है | कितने दर्द दिए हैं हमको, कैसे तुझे बताऊँ मैं, एक माह के उस दुनिया का, कैसे हाल सुनाऊँ मैं, ताने, गाली रोज सुनाते, सबके जूठे मुझे खिलाते, गहने,कपडे छीनी सारी, टूटे खाट पे मुझे सुलाते, चली गयी तो ना आउंगी, दूर कहीं मैं खो जाउंगी, बाबुल सारे काम करुँगी, पगड़ी की मैं लाज रखूंगी, देख ले सारे दाग मार के, बदन दिखा कर कहती है, इस अबला पर दया करो माँ तेरी पावं पकड़ती है, रोक लो बाबुल मुझको, बेटी तेरी पावं पकड़ती है |


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